हाल ये है कि बिहार के सरकारी स्कूलों से लोगों का मोह धीरे-धीरे खत्म
होता जा रहा है. सबसे ख़राब हाल तो प्रारंभिक और माध्यमिक विद्यालयों का
है, जहां नामांकन साल दर साल गिर रहा है. ड्रॉपआउट रेट में कोई कमी नहीं आ
रही है.
पिछले ही साल की ही बात है जब बिहार सरकार के शिक्षा विभाग ने उन स्कूलों को बंद करने का निर्देश जारी किया था जहां नामांकन या तो
शून्य या फिर 20 से कम पहुंच गया था.
'यू-डायस' के 2917-18 के आंकड़ो के मुताबिक़ शून्य नामांकन वाले स्कूलों की संख्या 13 है. जबकि 171
विद्यालयों में 20 से भी कम नामांकन है.
इसमें एक नया तथ्य यह जुड़ा
है कि कई विद्यालयों में ऊंची कक्षाओं में ज्यादा नामांकन हैं और पहली कक्षा में नामांकन बहुत कम है. आदर्श स्थिति यह होनी चाहिए थी कि प्रारंभिक
कक्षाओं में नामांकन अधिक हो और ऊपर की कक्षाओं में कम.
आरा के
पत्रकार भीम सिंह भवेश की एक रिपोर्ट के अनुसार भोजपुर के कई विद्यालयों में पहली और दूसरी कक्षा में नामांकित बच्चों की संख्या आठवीं के कुल नामांकन की 20 फ़ीसदी भी नहीं है. यह हाल केवल भोजपुर का ही नहीं बल्कि
ज़्यादातर जिलों का है.
मतलब साफ़ है. सरकारी स्कूलों से बच्चे कम होते जा रहे हैं. सरकार इसे रोकने में नाकाम दिखती है.
पत्रकार
भीम सिंह भवेश तो यहां तक कहते हैं, "बिहार में शिक्षा का निजीकरण हो रहा
है. और सरकार की नाक के नीचे हो रहा है. नामांकन दर बढ़ाने के अभियान
कागजों पर केवल दिखते हैं. अगर मध्याह्न भोजन, स्कूल ड्रेस, साइकिल और
छात्रवृत्ति की राशि मिलनी बंद हो जाए तो सरकारी स्कूलों में कोई बच्चा पढ़ने ही नहीं आएगा."
अशोक कुमार बताते हैं कि विद्यालय की स्थापना राजभवन कैंपस में इसलिए
हुई थी ताकि राजभवन के कर्मचारियों के बच्चे इसमें पढ़ सकें. लेकिन मौजूद
समय में इसमें शायद ही राजभवन के किसी कर्मचारी का बेटा पढ़ता होगा.
उन्होंने
बताया, "यहां के स्वीपर और चपरासी भी अपने बच्चों को अब प्राइवेट स्कूलों में ही भेजते हैं. ये बच्चे आस-पास के स्लम (झुग्गियों) से आते हैं. इससे बुरा क्या हो सकता है कि ख़ुद शिक्षक जिस स्कूल में पढ़ा रहे हैं, उसमें
अपने बच्चों को नहीं पढ़ाना चाहते. "
राजभवन से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर हज भवन के पीछे स्थित प्राथमिक विद्यालय की सचिव रुक्मिणी देवी
कहती हैं, "इसकी ज़िम्मेदार सरकार भी है और शिक्षक भी. सरकार स्कूल चलाने
में फ़ेल हो गई. ये शिक्षक भी तो उसी ने बनाए थे. सरकार के लोगों का जिसको
मन उसको शिक्षक बना दिया. सरकार का काम बजट बनाना, पुल-पुलिया बनाना,
रोड-रास्ता बनाना, स्कूल-कॉलेज बनाना है. सरकार शिक्षक नहीं बना सकती. सभी
सरकारी कर्मी बनकर रह गए हैं."
आख़िर सरकारी विद्यालयों की ऐसी हालत क्यों हो गई है? क्यों लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाना चाहते?
ऐसे तमाम सवालों में से कुछ के जवाब हमें पटना राजभवन के कैंपस में स्थित मध्य बालिका विद्यालय में मिले.
ये वो विद्यालय है जो चुनाव के समय मुख्यमंत्री और राज्यपाल का वोटिंग बूथ भी बन जाता है.
यहां
अशोक कुमार नाम के एक शिक्षक ने कहा, "देखिए, आप जो सब पूछ रहे हैं हमसे,
उनका हम इसी तरह जवाब दे सकते हैं कि शिक्षा एक तिपाई व्यवस्था है. इसमें
छात्र, अभिभावक और शिक्षक हैं. लेकिन बिहार की शिक्षा इस वक्त डेढ़ पाई पर
चल रही है. शिक्षक हमारे पास कैसे हैं, ये किसी से छुपा नहीं रह गया.
अभिभावकों की भूमिका आधी हो गई है क्योंकि वे आज के सबसे बड़े संकट ग़रीबी और बेरोज़गारी से जूझ रहे हैं. बचे छात्र. तो वे भी क्या करेंगे? जब तक
उनके अभिभावकों को लगता है कि सरकारी स्कूल में पढ़ाने फ़ायदा है, तब तक
भेज रहे हैं, बच्चे थोड़ा भी बोझ बनेंगे तो उन्हें भी आग की भट्ठी में झोंक देंगे."